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Showing posts from January, 2025

पावन भिक्षा (समर्थ गुरु रामदास) - गोविंददेव गिरि जी महाराज

पावन भिक्षा (समर्थ गुरु रामदास)  राम राम जय राजा राम। पावन भिक्षा दे दो राम।  कोमल वाणी दे दो राम। निर्मल करणी दे दो राम। कोमल वाणी दे दो राम। निर्मल करणी दे दो राम। प्रासंगिक मति दे दो राम। चतुराई भी दे दो राम।।1।। हितकारक जो दे दो राम। जनसुखकारक दे दो राम। इंगितज्ञता दे दो राम। बहुजन मैत्री दे दो राम।।2।। विद्या वैभव दे दो राम। उदासीनता दे दो राम।  अयाचना व्रत दे दो राम। मैं न जानू वह दे दो राम।।3।।  प्यार तुम्हारा दे दो राम। दास कहे मोहे दो श्रीराम।  संगीत गायन दे दो राम। गान मधुरता दे दो राम।।4।। सावधानता दे दो राम। ज्ञान कण्ठगत दे दो राम। दास कहे हे सद्गुण धाम। उत्तम गुण मोहे दे दो राम।।5।।  पावन भिक्षा दे दो राम। निर्मल मति मोहे दो श्रीराम।  अभेद भक्ति दे दो राम। आत्म निवेदन दे दो राम।।6।। तन्मयता मोहे दे दो राम। ब्रह्मचर्य व्रत दे दो राम। सज्जन संगति दे दो राम। राष्ट्र भक्ति दे दो राम।।7।। ब्रह्म अनुभव दे दो राम। अनंत सेवा दे दो राम।  पूर्ण समर्पण दे दो राम। दास कहे मोहे दो श्रीराम।।8।। राम राम जय राजा राम। पावन भिक्षा दे दो राम।

स्वामी विवेकानंद के सपनों का युवा

                                                              स्वामी विवेकानंद के सपनों का युवा (1) मुखमंडल तेजस्वी हो !                                                                 (2) वाणी ओजस्वी हो !                                                                      (3) शरीर में शक्ति हो ! (4) मन में उत्साह हो !        (5) सद्बुद्धि और विवेक हो !                                    ...

सद्गुणों की साधना में - गोविंद देव गिरी जी महाराज

  सद्गुणों की साधना में, ध्येय - ज्योति नित जले।  संग्राममय जीवन धरा पर, विजय रथ ले हम चलें।।  हो समर्पण लखन जैसा, राम जैसा त्याग हो।  भीष्म सा हो नियम - पालन, शौर्य में अभिमन्यु हो।  आपदाओं को कुचलकर, वीर बालक हम चलें ।।1।। बुद्ध जैसे कारुणिक हों, धीर हम महावीर से।  ध्रुव जैसे निश्चयी, सत्याग्रही प्रहलाद से।  दुर्दम्य सारे संकटों में, अग्निपथ पर भी खिले ।।2।। हनुमान से सेवाव्रती, जिज्ञासु हों नचिकेत से।  कर्मयोगी कृष्ण जैसे, वीर हों हम पार्थ से।  बलिदान गोविंदसिंह सा हो, स्वार्थ सारा ही जले ।।3।। देशभक्ति हो शिवा सम, प्रेम हो गौरांग सा।  स्वाभिमान प्रताप सा हो, तेज झांसीवाली सा।  जलती शहीदों की चिता से, हृदय में अंगार लें ।।4।।