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Showing posts from February, 2025

वो दिन है कितना दूर, वो दिन है कितना दूर

 वो दिन है कितना दूर, वो दिन है कितना दूर  जब अपने - अपने सबके सपने होंगे पूरे,  ये देश मेरा जागे जग में सबसे आगे x 2 ये देश मेरा जागे जग में हो सबसे आगे - आगे  ये देश मेरा जागे जग में सबसे आगे x 2  पावन तीरथ जैसा सभी को लागे वो दिन है कितना दूर, वो दिन है कितना दूर।। वो दिन है कितना दूर, वो दिन है कितना दूर करो जतन मेरा वतन बने ऐसा चमन  देखे नयन झूमे सभी का मगन तन मन  करो जतन मेरा वतन बने ऐसा चमन  देखे नयन झूमे सभी का मगन तन मन  स्वर्ग से सुंदर ऐसा सभी को लागे वो दिन है कितना दूर, वो दिन है कितना दूर।। वो दिन है कितना दूर, वो दिन है कितना दूर जो भी हो तुम वही है हम चाहे जो है धर्म एक ही है कोम इसी माटी में लिया है तो जनम  मां की मूरत ऐसा सभी को लागे वो दिन है कितना दूर, वो दिन है कितना दूर  जब अपने - अपने सबके सपने होंगे पूरे,  ये देश मेरा जागे जग में सबसे आगे x 2 ये देश मेरा जागे जग में हो सबसे आगे - आगे  ये देश मेरा जागे जग में सबसे आगे x 2  पावन तीरथ जैसा सभी को लागे वो दिन है कितना दूर, वो दिन है कितना दूर वो दिन...

पाठ्य पुस्तकें कुछ कहना चाहती हैं.............

    पाठ्य पुस्तकें कुछ कहना चाहती हैं............. प्यारे दोस्तों , मैं आपका दोस्त हूँ I ऐसा दोस्त जो आपको बहुत सी नई – नई जानकारीयां देगा I देश और दुनिया के बारे में बताएगा I परिवार और समाज में मिल – जुल कर रहना सीखाएगा I चाँद और तारों के किस्से सुनाएगा I एक जोड़ एक , दो होता है और एक और एक मिलकर ग्यारह होते हैं कैसे ? इसका रहस्य बताएगा I एक सभ्य नागरिक बनने के सारे गुण सीखाएगा I बस..... मुझसे दोस्ती करने के लिए आपको एक कदम बढ़ाना होगा I Ø   सबसे पहले मुझे संभाल कर रखना होगा I जिल्द लगा कर मेरा तन ढकना होगा I जिल्द पारदर्शी हो , ताकि मेरे आवरण से हमेशा आप रु – ब – रु हों I Ø   मुझको बोल – बोल कर पढ़ना होगा I सुनना और समझना होगा I गुरुजी के पढ़ाने से पहले खुद मुझको पढ़कर समझने की कोशिश करनी होगी I जब समझ में न आये मेरी बात तो आप करो गुरुजी से प्रश्न   I Ø   पेन्सिल का करें इस्तेमाल , मेरे अंदर ही हर बात , जो आपको लगे अच्छी , उसे रेखांकित कर बार – बार पढ़ें आप I Ø   पढ़ने के साथ लिखना भी होगा I मेरे अंदर लिखी बात को समझ कर अ...

पंचामृत (स्वामी रामसुखदास जी महाराज)

।। श्री हरि ।। पंचामृत (स्वामी रामसुखदास जी महाराज) (1) हम भगवान के ही हैं।  (2) हम जहां भी रहते हैं, भगवान के ही दरबार में रहते हैं।  (3) हम जो भी शुभ काम करते हैं, भगवान का ही काम करते हैं।  (4) शुद्ध - सात्विक जो भी पाते हैं, भगवान का ही प्रसाद पाते हैं।  (5) भगवान के दिये प्रसाद से भगवान के ही जनों की सेवा करते हैं।

सेठजी के अंतिम अमृतोपदेश (श्रद्धेय श्री जयदयाल जी गोयन्दका)

।। श्री हरि ।। सेठजी के अंतिम अमृतोपदेश (श्रद्धेय श्री जयदयाल जी गोयन्दका) (1) नित्य नियमपूर्वक अपने से बड़ों को प्रणाम करना, उनकी सेवा करना और उनका आज्ञा पालन करना।  (2) नित्य निरंतर भगवान के नाम का श्रद्धा सहित निष्काम भाव से प्रेम पूर्वक जाप करना और भगवान के स्वरूप का ध्यान करना।  (3) एक क्षण के लिए भी भगवान के नाम को कभी न भूलना।  (4) खूब मन से ये सब करना और जरा भी कमी रहे तो उसके लिए एकांत में श्रद्धा - विश्वास पूर्वक करुण भाव से गदगद होकर रोते हुए भगवान से प्रार्थना करना।  (5) सब को भगवान का स्वरूप समझना, सब वस्तुओं को भगवान की समझना, सब कार्य भगवान के समझना और भगवान के लिए ही सब काम करना।  (6) नित्य श्रद्धा - विश्वास पूर्वक निष्काम प्रेम के साथ यह सब करने पर शीघ्र भगवान की प्राप्ति हो सकती है।  (7) दुर्गुण, दुराचार, दुर्विचार, दुर्व्यसन, दंभ, मद, अभिमान, अधिक निद्रा, आलस्य, प्रमाद, विषय भोगों का तथा भोगियों का संग - इनको विष के समान समझना, इनका सर्वथा त्याग कर देना चाहिए। ये सब आसुरी संपत्ति हैं।  (8) सद्गुण, सदाचार, सद्विचार, सत्संग, सरलता, साध...

श्री जानकीनाथ जी की आरती

 श्री जानकीनाथ जी की आरती ॐ जय जानकीनाथा, हो प्रभु जय श्री रघुनाथा। दोउ कर जोरें बिनवौं, प्रभु मेरी सुनो बाता॥  ॐ जय..॥ तुम रघुनाथ हमारे, प्राण पिता माता। तुम ही सच्चे संगी, भक्ति मुक्ति दाता॥  ॐ जय..॥ लख चौरासी काटो, मेटो यम त्रासा। निशदिन प्रभु मोहि रखिये, अपने ही पासा॥  ॐ जय..॥ राम भरत लछिमन, सँग शत्रुहन भैया। जगमग ज्योति विराजै, शोभा अति लहिया॥  ॐ जय..॥ हनुमत नाद बजावत, नेवर झमकाता । स्वर्णथाल कर आरती, करत कौशल्या माता॥  ॐ जय..।। किरिट मुकुट कर धनुष विराजत, शोभा अति भारी। तुलसीदास दर्शन करि, भक्त जन दर्शन करि, पल-पल बलिहारी॥  ॐ जय..॥ जय जानकिनाथा, हो प्रभु जय श्री रघुनाथा। हो प्रभु जय सीता माता, हो प्रभु जय लक्ष्मण भ्राता॥  ॐ जय..॥ हो प्रभु जय चारौं भ्राता, हो प्रभु जय हनुमत दासा। दोउ कर जोड़े विनवौं, प्रभु मेरी सुनो बाता॥  ॐ जय..॥

वृक्ष देवता की आरती

वृक्ष देवता की आरती ॐ जय वृक्ष देवा, स्वामी जय जय वृक्ष देवा। मधुर मधुर फल दाता, मधुर मधुर फल दाता।  शीतल छांव दाता।। ॐ जय वृक्ष देवा ....... (1) तुम धरती के रक्षक, प्राण वायु दाता।  स्वस्थ्य सुखी हो सब जन, स्वस्थ्य सुखी हो सब जन।  तुम आश्रय दाता।। ॐ जय वृक्ष देवा ....... (2) श्याम घटा के दर्शन, तुम बिन न होते। तुम देकर के निमंत्रण, तुम देकर के निमंत्रण।  बादल बरसाते।। ॐ जय वृक्ष देवा ....... (3) सुंदर पक्षी चहकते, डाल - डाल तेरी।  कोयल कूह कूह  कूके, कोयल कूह कूह  कूके।  महिमा गाय तेरी।। ॐ जय वृक्ष देवा ....... (4) आरोग्य है तुमसे मिलता, फल - फूल मिले अनुपम।  परोपकारी प्रभु तुम हो, परोपकारी प्रभु तुम हो।  तुम जीवन दाता।। ॐ जय वृक्ष देवा ....... (5)