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पंचामृत (स्वामी रामसुखदास जी महाराज)

।। श्री हरि ।।

पंचामृत (स्वामी रामसुखदास जी महाराज)

(1) हम भगवान के ही हैं। 

(2) हम जहां भी रहते हैं, भगवान के ही दरबार में रहते हैं। 

(3) हम जो भी शुभ काम करते हैं, भगवान का ही काम करते हैं। 

(4) शुद्ध - सात्विक जो भी पाते हैं, भगवान का ही प्रसाद पाते हैं। 

(5) भगवान के दिये प्रसाद से भगवान के ही जनों की सेवा करते हैं।

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