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सेठजी के अंतिम अमृतोपदेश (श्रद्धेय श्री जयदयाल जी गोयन्दका)

।। श्री हरि ।।

सेठजी के अंतिम अमृतोपदेश (श्रद्धेय श्री जयदयाल जी गोयन्दका)

(1) नित्य नियमपूर्वक अपने से बड़ों को प्रणाम करना, उनकी सेवा करना और उनका आज्ञा पालन करना। 

(2) नित्य निरंतर भगवान के नाम का श्रद्धा सहित निष्काम भाव से प्रेम पूर्वक जाप करना और भगवान के स्वरूप का ध्यान करना। 

(3) एक क्षण के लिए भी भगवान के नाम को कभी न भूलना। 

(4) खूब मन से ये सब करना और जरा भी कमी रहे तो उसके लिए एकांत में श्रद्धा - विश्वास पूर्वक करुण भाव से गदगद होकर रोते हुए भगवान से प्रार्थना करना। 

(5) सब को भगवान का स्वरूप समझना, सब वस्तुओं को भगवान की समझना, सब कार्य भगवान के समझना और भगवान के लिए ही सब काम करना। 

(6) नित्य श्रद्धा - विश्वास पूर्वक निष्काम प्रेम के साथ यह सब करने पर शीघ्र भगवान की प्राप्ति हो सकती है। 

(7) दुर्गुण, दुराचार, दुर्विचार, दुर्व्यसन, दंभ, मद, अभिमान, अधिक निद्रा, आलस्य, प्रमाद, विषय भोगों का तथा भोगियों का संग - इनको विष के समान समझना, इनका सर्वथा त्याग कर देना चाहिए। ये सब आसुरी संपत्ति हैं। 

(8) सद्गुण, सदाचार, सद्विचार, सत्संग, सरलता, साधुता, नम्रता, ज्ञान, वैराग्य एवं ईश्वर की भक्ति - इनको अमृत के समान समझकर इनका नित्य निरंतर सेवन करना चाहिए। यह दैवी संपत्ति है। 

(9) आसुरी संपदा नरक के लिए है और दैवी संपदा कल्याण करने वाली है।

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