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सद्गुणों की साधना में - गोविंद देव गिरी जी महाराज


 

सद्गुणों की साधना में, ध्येय - ज्योति नित जले। 

संग्राममय जीवन धरा पर, विजय रथ ले हम चलें।। 

हो समर्पण लखन जैसा, राम जैसा त्याग हो। 

भीष्म सा हो नियम - पालन, शौर्य में अभिमन्यु हो। 

आपदाओं को कुचलकर, वीर बालक हम चलें ।।1।।

बुद्ध जैसे कारुणिक हों, धीर हम महावीर से। 

ध्रुव जैसे निश्चयी, सत्याग्रही प्रहलाद से। 

दुर्दम्य सारे संकटों में, अग्निपथ पर भी खिले ।।2।।

हनुमान से सेवाव्रती, जिज्ञासु हों नचिकेत से। 

कर्मयोगी कृष्ण जैसे, वीर हों हम पार्थ से। 

बलिदान गोविंदसिंह सा हो, स्वार्थ सारा ही जले ।।3।।

देशभक्ति हो शिवा सम, प्रेम हो गौरांग सा। 

स्वाभिमान प्रताप सा हो, तेज झांसीवाली सा। 

जलती शहीदों की चिता से, हृदय में अंगार लें ।।4।।


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